Delhi: देशभर में सड़क हादसों में जान गंवाने वाली गृहिणियों के मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। साथ ही साथ यह भी कहा कि घर संभालने वाली महिलाएं केवल परिवार ही नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। इसलिए उन्हें सिर्फ होम मेकर कहने के बजाय ‘नेशन बिल्डर’ कहा जाना चाहिए।
दरअसल, जब भी किसी हादसे में इंसान की मौत हो जाती हैं तो उसकी कमाई या फिर सैलरी के हिसाब से मुआवजा तय होता है। लेकिन जब बात होम मेकर महिलाओं से जुड़े केस की हो तो यह मामला कुछ उलझा-उलझा नजर आता हैं। क्योंकि होम मेकर महिलाओं की कोई तय कमाई नहीं होती ऐसी स्थिति को लेकर ही आज सुप्रीम कोर्ट ने होम मेकर के मुआवजे के संबंध में एक बड़ा फैसला सुनाया हैं।
सर्वोच्च अदालत ने कहा हैं कि दुर्घटना के कारण जब किसी गृहिणी की मृत्यु हो जाती है तब उसका मुआवजा तय करने के लिए उनके योगदान का आकलन करना बहुत जरूरी हैं। क्योंकि उनका योगदान सिर्फ परिवार तक ही सीमित नहीं हैं। बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में भी होता है।
बता दें कि, न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश कोटिस्वर सिंह वाली बेंच ने इस केस की सुनवाई के दौरान कहा कि किसी हादसे में होम मेकर की मौत होने पर उनके द्वारा की जाने वाली देखभाल और घरेलू काम की कीमत कम से कम 30,000 रुपए प्रति महीना मानी जाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि यह रकम 'प्रणय सेठी' मामले में तय अन्य सभी मुआवजा नियमों के अलावा होगी।
दो दशकों तक उलझा रहा मामला
बता दें कि, साल 2001 में पंजाब की रेशमा नाम की महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। जिसके बाद उसके पति और 3 बच्चों ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था। ट्रिब्यूनल ने 2003 में फैसला दिया, लेकिन सालों तक ये मामला यूं ही उलझा रहा और फिर 23 साल बाद दिसंबर 2024 में आकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की अपील पर अंतिम फैसला सुनाया गया।
दो दशक से ज्यादा समय की हुई इस देरी पर चिंता जताते हुए कोर्ट ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट मुआवजे जैसे मामले पर एक साल के भीतर फैसला हो जाना चाहिए अगर पीड़ित परिवार को दशकों तक इंतजार करना पड़े तो कानून का मकसद ही खत्म हो जाता हैं। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी दोहराया कि मुआवजा अब व्यावहारिक होना चाहिए। यह न तो किसी के लिए अचानक छप्परफाड़ लॉटरी जैसा होना चाहिए और न ही रकम इतनी कम होनी चाहिए कि पीड़ित का मजाक बने।
