Birth Death Certificate Update: जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाने की योजना बना रहे हैं। तो यह खबर आपके लिए बेहद अहम है। संसद के मानसून सत्र के 10वें दिन लोकसभा में भारी हंगामे के बीच जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक 2026 को मंजूरी मिल गई। इस संशोधन के बाद दो साल से अधिक देरी से जन्म या मृत्यु का पंजीकरण कराना पहले जितना आसान नहीं रहेगा। अब ऐसे मामलों में सिर्फ आवेदन देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जांच की प्रक्रिया और मंजूरी का स्तर भी पहले से अधिक सख्त हो जाएगा। सरकार का कहना है कि यह बदलाव फर्जी प्रमाणपत्रों पर लगाम लगाने और पंजीकरण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी व विश्वसनीय बनाने के उद्देश्य से किया गया है।
आज के समय में जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र केवल पहचान के दस्तावेज तक सीमित नहीं, बल्कि स्कूल में दाखिले, पासपोर्ट, सरकारी योजनाओं का लाभ, संपत्ति से जुड़े विवाद और कई कानूनी प्रक्रियाओं का अहम आधार बन चुके हैं। ऐसे में गलत या फर्जी रजिस्ट्रेशन को रोकने के लिए सरकार ने नियमों को और मजबूत करने का फैसला लिया है। और यह विधेयक विपक्ष के हंगामे के बीच बिना चर्चा के पारित हो गया है।
क्या कहता है नया नियम?
नए संशोधन के तहत यदि किसी व्यक्ति के जन्म या मृत्यु का पंजीकरण घटना के दो साल से अधिक समय बाद कराया जाता है। तो अब प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक सख्त होगी। ऐसे मामलों में आवेदक को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate First Class) के समक्ष आवेदन करना होगा। और मजिस्ट्रेट उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों की जांच करने के बाद ही रजिस्ट्रेशन की अनुमति देंगे।
अगर बात मौजूदा नियमों की करें तो इसके अनुसार जन्म या मृत्यु का पंजीकरण एक साल से अधिक देरी से कराया जाता है। तो जिला मजिस्ट्रेट (DM), उप जिला मजिस्ट्रेट (SDM) या कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होती है। नए कानून में एक से दो साल की देरी वाले मामलों के लिए यही व्यवस्था जारी रहेगी। लेकिन दो साल से अधिक पुराने मामलों में अब प्रशासनिक अधिकारियों की जगह प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी अनिवार्य होगी। यानी कुल मिलाकर ऐसे मामलों में अब न्यायिक स्तर पर जांच और निगरानी के बाद ही जन्म या मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किया जा सकेगा।
क्यों किया गया नियम में बदलाव?
सरकार का कहना है कि जन्म और मृत्यु का सटीक रिकॉर्ड किसी भी देश की प्रशासनिक व्यवस्था की मजबूत आधार होता है। जनगणना, स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, सरकारी कल्याणकारी कार्यक्रमों और नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सही और समय पर दर्ज आंकड़े बेहद जरूरी हैं। यदि जन्म या मृत्यु का पंजीकरण लंबे समय तक नहीं कराया जाता। तो सरकारी रिकॉर्ड और डेटा की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसके अलावा देरी से होने वाले रजिस्ट्रेशन में फर्जी दस्तावेजों, गलत जानकारी और रिकॉर्ड में हेरफेर की आशंका भी बढ़ जाती है। कई मामलों में पुराने रिकॉर्ड बदलने या नए दस्तावेज तैयार कर गलत तरीके से प्रमाणपत्र हासिल करने की कोशिश भी की जाती है। इन्हीं संभावित गड़बड़ियों को रोकने के लिए सरकार ने दो साल से अधिक देरी वाले मामलों में न्यायिक जांच की व्यवस्था लागू करने का फैसला किया है।
किन लोगों पर पड़ेगा नए नियम का असर?
नए संशोधन का सबसे अधिक प्रभाव उन लोगों पर पड़ेगा। जो जन्म या मृत्यु की घटना के दो साल से अधिक समय बाद उसका पंजीकरण कराने के लिए आवेदन करेंगे। ऐसे मामलों में अब केवल आवेदन देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि आवेदकों को अपने दावे के समर्थन में अतिरिक्त दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत करने पड़ सकते हैं। साथ ही मामले की जांच के बाद प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी मिलने पर ही रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी होगी।
हालांकि जो लोग निर्धारित समय सीमा के भीतर जन्म या मृत्यु का पंजीकरण कराते हैं। उनके लिए प्रक्रिया पहले की तरह ही जारी रहेगी और उन्हें किसी अतिरिक्त न्यायिक अनुमति की जरूरत नहीं होगी।
