Bankipur Election: बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने इस हाई-प्रोफाइल सीट पर बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार को 19,324 वोटों के अंतर से हराकर बड़ी जीत दर्ज की है। 30 जुलाई को हुए मतदान में 35 फीसदी से भी कम वोटिंग हुई थी, जिसके चलते कई तरह की राजनीतिक अटकलें लगाई जा रही थीं। नतीजों में प्रशांत किशोर को 64,151 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार 44,827 वोटों पर सिमट गए।
यह परिणाम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सरकार बनाई थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कुछ ही महीनों बाद ऐसा क्या हुआ, कि बांकीपुर की जनता ने उपचुनाव में अलग फैसला सुनाया? क्या स्थानीय मुद्दे बीजेपी पर भारी पड़ गए, या फिर प्रशांत किशोर की रणनीति और जनसंपर्क ने चुनाव की दिशा बदल दी?
हालांकि, किसी एक वजह को हार या जीत का कारण नहीं माना जा सकता, लेकिन बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों ने यह जरूर संकेत दिया है कि स्थानीय चुनावों के समीकरण अक्सर विधानसभा चुनावों से अलग होते हैं। इसीलिए आइए जानते हैं वे 5 बड़े कारण, जिनकी वजह से बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा और प्रशांत किशोर जीत हासिल करने में सफल रहे।
स्टूडेंट प्रोटेस्ट
बांकीपुर में बीजेपी की हार की पहली बड़ी वजह छात्र आंदोलन को माना जा रहा है। क्योंकि जिस समय बांकीपुर में चुनाव प्रचार चल रहा था, उसी दौरान दिल्ली में सीजेपी (CJP) के नेतृत्व में नीट पेपर लीक मामले को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए प्रदर्शन हो रहे थे। इसके बाद 20 जुलाई को 'चलो संसद' मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया गया, जिसकी चर्चा पूरे देश में हुई।
यही नहीं, इस घटना के बाद बिहार में भी विरोध प्रदर्शन तेज हो गए। और 25 जुलाई को 'बिहार बंद' का आह्वान किया गया। इसी बीच सिवान जिले में आंदोलन के दौरान एके-47 से फायरिंग का कथित वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। वहीं, पुलिस ने कई जगहों पर कार्रवाई करते हुए बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और कई लोगों को जेल भेजा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाओं का असर चुनावी नतीजों पर भी देखने को मिला।
भरत तिवारी एनकाउंटर मामला
बांकीपुर में बीजेपी की हार का दूसरा बड़ा कारण भोजपुर के बिलौटी गांव निवासी भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामला माना जा रहा है। इस घटना पर परिजनों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए, जबकि न्यायिक आयोग के गठन के बावजूद कार्रवाई में देरी को लेकर सरकार की आलोचना होती रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले ने लोगों में नाराजगी बढ़ाई और इसका असर उपचुनाव के नतीजों में दिखाई दिया।
बीजेपी में अंदरूनी कलह
बांकीपुर उपचुनाव में उम्मीदवार बदलने के फैसले ने बीजेपी के भीतर असंतोष को और बढ़ा दिया। पहले अभिषेक कुमार सिन्हा को टिकट दिया गया, लेकिन नामांकन के अगले ही दिन उनकी जगह नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बना दिया गया। इस फैसले के बाद पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता नाराज नजह आए। इतना ही नहीं, चुनाव को हल्के में लेने वाले कुछ नेताओं के बयानों ने भी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच गलत संदेश पहुंचाया। संगठन के भीतर तालमेल की कमी और गुटबाजी का फायदा प्रशांत किशोर को मिला
जेडीयू की निष्क्रियता और कम मतदान
इस चुनाव में जेडीयू की सक्रियता लगभग न के बराबर रही। यही कारण रहा कि चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी को अकेले मोर्चा संभालना पड़ा, जिससे गठबंधन की पूरी ताकत जमीन पर नजर नहीं आई। वहीं 35 फीसदी से भी कम मतदान ने भी बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ा दीं। विश्लेषकों के अनुसार उम्मीदवार बदलने जैसे फैसलों से मतदाताओं में गलत संदेश गया, जबकि प्रशांत किशोर की लगातार सक्रिय मौजूदगी ने चुनाव को पूरी तरह बदल दिया और मुकाबला उनके पक्ष में जाता दिखाई दिया।
सम्राट चौधरी पर केंद्रित चुनावी हमला
इस चुनाव में प्रशांत किशोर ने अपने प्रचार अभियान का मुख्य निशाना मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बनाया। उन्होंने अपने लगभग हर भाषण में सम्राट चौधरी पर सवाल उठाए, जबकि बीजेपी के अन्य बड़े नेताओं को अपेक्षाकृत कम निशाने पर लिया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शिक्षित और जागरूक मतदाताओं वाले बांकीपुर में यह रणनीति असरदार साबित हुई। फलस्वरूप, चुनावी बहस सरकार के विकास कार्यों से हटकर नेतृत्व और जवाबदेही पर केंद्रित हो गई, जिसका सीधा लाभ प्रशांत किशोर को मिला और वह इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले में जीत दर्ज करने में सफल रहे।
